मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की रोक: ग्राम रोजगार सहायक मार्गदर्शिका 2025 पर स्टे, चार सप्ताह में अगली सुनवाई

भोपाल में सोमवार को हुई सुनवाई में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ग्राम रोजगार सहायकों को तात्कालिक राहत देते हुए राज्य सरकार की ‘ग्राम रोजगार सहायक मार्गदर्शिका 2025’ पर अंतरिम रोक लगा दी। अदालत ने कहा कि अगले आदेश तक इस मार्गदर्शिका के आधार पर कोई कार्रवाई नहीं होगी और किसी भी रोजगार सहायक का ट्रांसफर नहीं किया जाएगा। यह आदेश उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया जिनमें नई ट्रांसफर नीति और सेवा समाप्ति से जुड़ी शर्तों को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि नई गाइडलाइन उनकी मूल सेवा शर्तों से मेल नहीं खाती। उनके अनुसार ग्राम रोजगार सहायकों की नियुक्ति पैतृक गांवों में स्थानीय कार्य प्रणाली के लिए की गई थी, जबकि नई नीति उन्हें दूसरे स्थानों पर भेजने की अनुमति देती है। याचिकाओं में यह भी तर्क रखा गया कि सेवा समाप्ति से जुड़ी नई शर्तें उनके रोजगार की स्थिरता पर असर डाल सकती हैं। अदालत ने प्रारंभिक स्तर पर इन तर्कों को विचार योग्य माना और तब तक के लिए नीति के अमल पर रोक लगा दी।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की गई है। इस बीच राज्य प्रशासन मार्गदर्शिका 2025 के जिन प्रावधानों के आधार पर स्थानांतरण या सेवा संबंधी दंडात्मक निर्णय लेना चाहता था, वह प्रक्रिया रुकी रहेगी। न्यायालय के इस आदेश का सीधा असर उन हजारों कर्मचारियों पर पड़ा है जो पिछले कुछ समय से संभावित ट्रांसफर को लेकर असमंजस में थे।

मामले की पृष्ठभूमि रोजगार गारंटी योजना की शुरुआत से जुड़ी है। राज्य में योजना लागू होने के दौरान कामों का डिजिटल रिकॉर्ड रखने, मजदूरों के भुगतान और कार्य प्रगति का डेटा व्यवस्थित करने के लिए बड़े पैमाने पर ग्राम रोजगार सहायकों की भर्ती हुई थी। उस समय शिवराज सरकार ने लगभग 28 हजार पदों पर नियुक्तियां की थीं। चयन में 12वीं कक्षा के अंकों और कंप्यूटर डिप्लोमा, जैसे PGDCA, को आधार बनाया गया था।

इन नियुक्तियों की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि अधिकांश रोजगार सहायकों को उनके ही पैतृक गांवों या आसपास के स्थानीय क्षेत्र में पदस्थ किया गया। प्रशासनिक तर्क यह था कि स्थानीय पहचान, ग्राम स्तर की समझ और लगातार उपलब्धता से मनरेगा कार्यों की निगरानी बेहतर होगी। गांव स्तर पर डिजिटल प्रक्रिया सीमित होने और कई जगह कंप्यूटर संचालन में दक्ष स्टाफ की कमी के कारण रोजगार सहायकों पर ही डेटा एंट्री, मस्टर रोल, कार्य प्रगति और भुगतान से संबंधित दस्तावेजों का भार रहा।

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में यही बिंदु रखा कि जब नियुक्ति की प्रकृति स्थानीय तंत्र पर आधारित रही है, तब व्यापक स्थानांतरण नीति सेवा संरचना में मूल बदलाव जैसा है। उनका कहना था कि यदि ट्रांसफर बड़े पैमाने पर लागू हुआ तो स्थानीय कार्य समन्वय प्रभावित हो सकता है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि नई सेवा शर्तें पूर्व व्यवस्था के विपरीत हैं और इन्हें एकतरफा तरीके से लागू नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने अंतिम फैसला दिए बिना सिर्फ अंतरिम स्तर पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है।

वेतन संरचना का मुद्दा भी इस बहस के केंद्र में रहा है। भर्ती के शुरुआती वर्षों में ग्राम रोजगार सहायकों को करीब 9,000 रुपये मासिक मानदेय मिलता था। बाद में विभिन्न मदों से राशि जोड़कर इसे लगभग 18,000 रुपये तक बढ़ाया गया। हालांकि, कर्मचारियों का कहना रहा है कि उनकी जिम्मेदारियां समय के साथ बढ़ी हैं और नीतिगत बदलावों में सेवा सुरक्षा तथा कार्यस्थल स्थिरता पर भी समान ध्यान जरूरी है।

फिलहाल हाईकोर्ट का आदेश अंतरिम है और अंतिम निष्कर्ष जवाबों व अगली सुनवाई के बाद ही सामने आएगा। लेकिन तत्काल स्थिति यह है कि राज्य की नई मार्गदर्शिका 2025 लागू नहीं होगी और ट्रांसफर प्रक्रिया भी रुकी रहेगी। अगले चार सप्ताह में सरकार की तरफ से दायर जवाब इस मामले की दिशा तय करेंगे। अदालत का अंतिम निर्णय यह स्पष्ट करेगा कि ग्राम रोजगार सहायकों की नियुक्ति की मूल प्रकृति, नई ट्रांसफर नीति और सेवा शर्तों के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाएगा।